EV To EBITDA Ratio Kya Hota Hai? Formula, Example और सही इस्तेमाल

ev to ebitda ratio kya hota hai

दो कंपनियां देखने में एक जैसी लगती हैं, फिर भी एक सस्ती और दूसरी महंगी दिखती है। सही तुलना कैसे करें, इसी उलझन का जवाब है EV/EBITDA ratio kya hota hai, यह समझना।

इस लेख में फॉर्मूला, उदाहरण और सीमाएं सरल भाषा में हैं। कोई सलाह या मुनाफे का वादा नहीं है, सिर्फ साफ समझ है।

EV To EBITDA Ratio In Hindi

सोचिए आप एक दुकान खरीदने जा रहे हैं। दुकान का दाम 10 लाख है, लेकिन उस पर 4 लाख का कर्ज भी चल रहा है।

तो असली कीमत सिर्फ 10 लाख नहीं होती, कर्ज भी आपको ही चुकाना पड़ेगा।

EV/EBITDA ratio यही असली कीमत देखता है। यह बताता है कि पूरे कारोबार की कीमत, उसकी कमाई के मुकाबले कितनी गुना है।

EV टू EBITDA रेश्यो का फॉर्मूला, उदाहरण और तुलना तालिका को दर्शाने वाला ग्राफिक।
जानिए EV/EBITDA रेश्यो का फॉर्मूला, गणना और इसके सही इस्तेमाल का तरीका।

यह एक सरल अनुपात है, इसलिए शुरुआत करने वालों के लिए भी पढ़ना आसान है। लेकिन इसे समझने के लिए पहले EV को समझना ज़रूरी है।

Enterprise Value क्या होता है?

Enterprise value यानी EV, किसी कंपनी की पूरी कारोबारी कीमत है। इसमें शेयरधारकों की हिस्सेदारी और कर्ज, दोनों गिने जाते हैं।

इसके बाद कंपनी के पास पड़ी नकद राशि घटाई जाती है। सीधा सूत्र है: EV = मार्केट कैप + कर्ज – नकद।

जिसे मार्केट कैप क्या होता है पहले से पता हो, उसके लिए यह जोड़ना बहुत आसान है।

नकद इसलिए घटाई जाती है कि खरीदने वाला उस नकद से कर्ज का कुछ हिस्सा तुरंत चुका सकता है। नीचे की तालिका में सिर्फ समझाने के लिए एक काल्पनिक कंपनी की गणना है।

मदराशि (करोड़ रुपये, काल्पनिक)
मार्केट कैप1,000
कर्ज (जोड़ें)500
नकद (घटाएं)100
EV = 1,000 + 500 – 1001,400

ये सभी आंकड़े सिर्फ समझाने के लिए हैं, किसी असली कंपनी के नहीं हैं।

EV EBITDA Kaise Nikale?

कंपनी महंगी है या सस्ती, इसका जवाब सिर्फ भाव देखकर नहीं मिलता। इसके लिए कीमत और कमाई को एक ही तराज़ू पर रखना पड़ता है।

फॉर्मूला बहुत छोटा है: EV/EBITDA = EV ÷ EBITDA। ऊपर आता है कारोबार की पूरी कीमत, और नीचे आती है उसकी परिचालन कमाई।

नीचे जिस आंकड़े से भाग देना है, उसकी परिभाषा हमने यहां नहीं दोहराई है। अगर आपने अभी ईबीआईटीडीए (EBITDA Meaning in Hindi) नहीं पढ़ा, तो एक बार वह देख लीजिए और फिर यहां लौट आइए।

मान लीजिए EV 1,400 करोड़ है और EBITDA 150 करोड़ है। तब 1,400 ÷ 150 = 9.33।

यानी कारोबार की कीमत उसकी EBITDA से लगभग 9.3 गुना है।

यह भी सिर्फ समझाने के लिए है। असली कंपनी का आंकड़ा कंपनी की आधिकारिक रिपोर्ट से ही लीजिए।

कंपनियों के ये जरूरी आंकड़े और वैल्यूएशन डेटा कहां मिलेंगे?

कर्ज और नकद की रकम कंपनी की तिमाही या वार्षिक रिपोर्ट में मिलती है।

कंपनी की बैलेंस शीट कैसे चेक करें यह जानने वाले को ये दोनों संख्याएं मिनटों में दिख जाती हैं।

मार्केट कैप शेयर के भाव और कुल शेयरों की संख्या से बनता है। हमेशा ताज़ा आंकड़ा लीजिए, क्योंकि भाव रोज़ बदलता है।

यह रेश्यो क्या है? बराबर Market Cap और अलग Debt का उदाहरण

अब असली मज़ा यहां है। दो काल्पनिक कंपनियां लीजिए, जिनका मार्केट कैप बराबर है, लेकिन कर्ज अलग है।

दोनों की EBITDA भी 150 करोड़ मान लीजिए। पहले नीचे की तालिका देखिए।

यहां की सभी गणनाएं सिर्फ समझाने के लिए हैं और कोड से निकाली गई हैं।

बात (करोड़ रुपये)कंपनी Aकंपनी B
मार्केट कैप1,0001,000
कर्ज0500
नकद100100
EV9001,400
EBITDA150150
EV/EBITDA6.09.33

अगर सिर्फ मार्केट कैप को EBITDA से भाग देते, तो दोनों का नतीजा 6.67 आता और दोनों बराबर लगतीं।

लेकिन कंपनी B पर कर्ज का बोझ है, इसलिए उसे खरीदने की असली कीमत ज़्यादा है।

विभिन्न उद्योगों (भारी उद्योग, सर्विस सेक्टर, यूटिलिटीज) में सामान्य EV/EBITDA स्तर को दर्शाने वाला तुलनात्मक चार्ट।
जानिए भारी उद्योग, सर्विस सेक्टर और यूटिलिटीज में EV/EBITDA के सामान्य स्तर (काल्पनिक उदाहरण)।

EV/EBITDA यह फर्क पकड़ लेता है। कंपनी A का 6.0 और कंपनी B का 9.33 बताता है कि कमाई के मुकाबले B का कारोबार महंगा है।

EBITDA बदलने पर EV/EBITDA Ratio कैसे बदलता है?

अब कंपनी B की EBITDA 150 से बढ़कर 200 करोड़ हो जाए, और EV वही 1,400 करोड़ रहे। तब 1,400 ÷ 200 = 7.0 आएगा।

यानी कमाई बढ़ने पर अनुपात घटता है, भले ही कीमत न बदली हो। उल्टा, कमाई घटे तो अनुपात ऊपर चढ़ता है।

इसलिए अनुपात बदलने के दो कारण हो सकते हैं: कीमत का बदलना या कमाई का बदलना। हमेशा देखिए कि असली वजह कौन-सी है।

कमाई कितनी मज़बूत है, यह परखने के लिए EBITDA मार्जिन कितना होना चाहिए देखना काम आता है।

यह भी सिर्फ समझाने के लिए है।

Ev कैलकुलेट करने के 5 आसान स्टेप्स

अगर अब तक की बात समझ आ गई है, तो यह हिसाब खुद करना मुश्किल नहीं है। नीचे के कदम किसी भी कंपनी पर एक जैसे लागू होते हैं।

  1. कंपनी का ताज़ा मार्केट कैप लीजिए।
  2. रिपोर्ट से कुल कर्ज और नकद निकालिए।
  3. EV = मार्केट कैप + कर्ज – नकद का हिसाब कीजिए।
  4. पिछले बारह महीनों की EBITDA लीजिए।
  5. EV को EBITDA से भाग दीजिए और उसी उद्योग से तुलना कीजिए।

यहां एक ज़रूरी बात है। महंगा दिखना अपने आप में गलत नहीं है, और सस्ता दिखना अपने आप में सही नहीं है।

यह सिर्फ एक संकेत है, फैसला नहीं।

EV to EBITDA in Hindi: इसका इस्तेमाल क्यों होता है?

विश्लेषक इस अनुपात को इसलिए पसंद करते हैं कि यह कंपनी की पूंजी बनावट से लगभग अप्रभावित रहता है।

यानी कंपनी ने पैसा कर्ज से जुटाया या शेयर बेचकर, इससे तुलना कम बिगड़ती है। इसके तीन मुख्य कारण हैं।

  • कर्ज का असर: अलग-अलग कर्ज वाली कंपनियों की तुलना सही बैठती है।
  • ब्याज और कर से मुक्त: EBITDA में ब्याज और कर पहले ही बाहर रहते हैं।
  • अधिग्रहण में उपयोग: पूरी कंपनी की कीमत आंकने में यह काम आता है।

जिसे कंपनी के कर्ज का स्तर परखना हो, उसके लिए डेट टू इक्विटी रेशियो साथ में देखना अच्छा रहता है। दोनों मिलकर तस्वीर पूरी करते हैं।

ध्यान रखिए कि यह अनुपात अकेला जादू नहीं है। इसे कंपनी की बाकी जानकारी के साथ ही पढ़ना चाहिए।

EV/EBITDA Kitna Achha Hota Hai?

यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है, और ईमानदार जवाब है कि कोई एक अच्छा अंक होता ही नहीं। 8 अच्छा है या 15, यह सिर्फ अंक देखकर तय नहीं होता।

कारण यह है कि हर उद्योग की बनावट अलग होती है। भारी मशीनों वाले उद्योग का सामान्य स्तर अलग रहता है, और कम पूंजी वाले सेवा उद्योग का अलग।

इसलिए दो तरीके अपनाइए।

  • उसी उद्योग की कंपनियों से तुलना: सिर्फ मिलते-जुलते कारोबार वाली कंपनियों को आमने-सामने रखिए।
  • कंपनी का अपना इतिहास: पिछले कई सालों में उसका अनुपात कैसे बदला, यह देखिए।

तुलना करते समय कमाई की गुणवत्ता भी परखिए। ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन क्या है जानने से पता चलता है कि कंपनी हर रुपये की बिक्री पर कितना बचाती है।

कम अंक का मतलब हमेशा सस्ता नहीं होता, और ज़्यादा अंक का मतलब हमेशा महंगा नहीं होता।

कंपनी तेज़ी से बढ़ रही हो तो बाज़ार ऊंचा अंक भी स्वीकार कर लेता है।

अगर आप ऐसे अनुपातों को असली अभ्यास से सीखना चाहते हैं, तो विशेषज्ञों से सीधे सीखना काम आ सकता है। इसकी जानकारी इस लेख के अंत में दी गई है।

EV To EBITDA Ratio की कमियां

हर अनुपात की सीमा होती है, और इसकी भी है। नीचे वे स्थितियां हैं जहां यह तस्वीर अधूरी दिखाता है।

  • भारी पूंजीगत खर्च: जिन कंपनियों को मशीनों और संयंत्रों पर बार-बार बड़ी रकम लगानी पड़ती है, उनकी EBITDA अच्छी दिखती है। पर जेब में बचत कम होती है।
  • नकारात्मक EBITDA: अगर EBITDA शून्य या नकारात्मक है, तो भाग का नतीजा किसी काम का नहीं रहता।
  • बैंक और NBFC: इन संस्थाओं के लिए ब्याज ही असली कारोबार है, इसलिए EBITDA की धारणा उन पर ठीक से नहीं बैठती।
  • अस्थायी कमाई: एक बार की बड़ी कमाई EBITDA को फुला सकती है।

पूंजी पर असली कमाई जांचने के लिए आरओसीई ( ROCE Meaning in Hindi ) समझना मदद करता है। यह बताता है कि लगाई गई पूंजी पर कंपनी कितना कमा रही है।

इसलिए एक ही अनुपात पर पूरा भरोसा मत कीजिए। कई आंकड़े साथ देखना ज़्यादा सुरक्षित तरीका है।

EV/EBITDA vs PE Ratio: फर्क क्या है और कौन सा बेहतर है?

दोनों अनुपात कीमत और कमाई की तुलना करते हैं, लेकिन देखने का नज़रिया अलग है।

PE ratio सिर्फ शेयरधारकों की नज़र से देखता है, जबकि EV/EBITDA पूरे कारोबार की नज़र से।

कर्ज वाली कंपनियों में यह फर्क बड़ा हो जाता है। पीई रेशियो का मतलब अलग लेख में विस्तार से है, इसलिए यहां सिर्फ तुलना दी गई है।

नीचे की तालिका में दोनों का सीधा मुकाबला है।

बातEV/EBITDAPE ratio
किसकी कीमतपूरे कारोबार की (EV)सिर्फ शेयर की
किससे भागEBITDAप्रति शेयर कमाई
कर्ज का असरशामिल रहता हैअप्रत्यक्ष रूप से
ब्याज और करपहले ही बाहरशामिल रहते हैं
किसके लिए अच्छाअलग कर्ज वाली कंपनियों की तुलनासीधे शेयर की कमाई की समझ
कमज़ोरीभारी पूंजीगत खर्च छिपा सकता हैकर्ज का बोझ ढक सकता है

इसलिए दोनों में से किसी को भी हीरो या विलेन मत बनाइए। समझदारी इसी में है कि दोनों को साथ रखकर देखा जाए।

कई अनुपातों को साथ पढ़ने की यह आदत सीखनी हो, तो बुनियादी विश्लेषण(Fundamental Analysis in Hindi ) कैसे करें से शुरुआत कीजिए।

EV/EBITDA इस्तेमाल करते समय 5 आम गलतियां

शुरुआत करने वाले अक्सर कुछ गलतियां दोहराते हैं। इन्हें पहले से जान लेना आपका समय और नुकसान दोनों बचा सकता है।

  • EV की जगह सिर्फ मार्केट कैप लेना: तब कर्ज का असर गायब हो जाता है।
  • नकद घटाना भूल जाना: इससे EV ज़रूरत से ज़्यादा आ जाता है।
  • अलग उद्योगों की तुलना: दो अलग क्षेत्रों के अंकों को आमने-सामने रखना।
  • कम अंक देखकर खरीदने की सोच: कम अंक का मतलब सस्ता और सुरक्षित नहीं होता।
  • पुराने आंकड़े लेना: भाव और कर्ज दोनों बदलते रहते हैं।

सबसे बड़ी गलती यह है कि इस अनुपात को खरीद या बिक्री का संकेत मान लिया जाए। यह सिर्फ तुलना का औज़ार है।

क्या आप भी दो कंपनियों के EV/EBITDA देखकर उलझ जाते हैं कि कौन सी महंगी है और कौन सी सस्ती?

सिर्फ articles पढ़ने से हिसाब लगाना नहीं आता, असली कंपनियों के आंकड़ों पर practice और mentor के जवाब ही फर्क बनाते हैं।

हमारी live classes में आप अपने मोबाइल से जुड़ सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और step by step सीख सकते हैं।

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निष्कर्ष

EV/EBITDA ratio kya hota hai, इसका जवाब है: कारोबार की पूरी कीमत, यानी मार्केट कैप और कर्ज को जोड़कर नकद घटाने के बाद, उसकी परिचालन कमाई से भाग देना।

यह अनुपात कर्ज वाली कंपनियों की तुलना में मदद करता है। लेकिन कोई एक अंक हमेशा अच्छा या बुरा नहीं होता, इसलिए उद्योग और कंपनी के इतिहास से तुलना कीजिए।

आज का अगला कदम: किसी एक कंपनी का EV निकालकर EBITDA से भाग दीजिए और नतीजा लिख लीजिए।

अस्वीकरण: यह लेख सिर्फ शिक्षा के लिए है, निवेश सलाह नहीं। सभी आंकड़े काल्पनिक हैं और सिर्फ समझाने के लिए हैं। निजी फैसले आपकी आय, लक्ष्य और जोखिम सहने की क्षमता पर निर्भर करते हैं, इसलिए उनके लिए SEBI-पंजीकृत सलाहकार से मिलिए। शेयर बाज़ार में नुकसान हो सकता है।

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