Interest coverage ratio kya hai और निवेश से पहले यह जानना क्यों ज़रूरी है?
कंपनी अपना कर्ज़ का ब्याज आराम से भर पाती है या नहीं, यह इसी से पता चलता है।
कभी सोचा है कि जिस कंपनी में आप पैसा लगाने की सोच रहे हैं, उस पर कितना बोझ है?
Whether आप beginner हों या regular investor, कंपनी का कर्ज़ आपके पैसे पर सीधा असर डालता है।
So ICR एक आसान signal है जो कंपनी की financial सेहत का quick idea देता है। कोई profit का वादा नहीं, बस साफ समझ।
Interest Coverage Ratio Kya Hota Hai?
सोचिए आपकी महीने की कमाई 60,000 रुपये है और घर की EMI का ब्याज 20,000 रुपये है।
So आपकी कमाई ब्याज से तीन गुना है, और आप थोड़े निश्चिंत रहते हैं।
Similarly, कंपनी के लिए यही हिसाब ICR बताता है।
अगर आप सोच रहे हैं कि interest coverage ratio kya hai, तो यह कंपनी की ब्याज चुकाने की क्षमता का पैमाना है।
In short, यह दिखाता है कि कंपनी की कमाई उसके ब्याज के खर्च को कितनी बार “कवर” करती है।
Because ICR सिर्फ ब्याज की बात करता है, यह कर्ज़ की पूरी तस्वीर नहीं देता।
Still, यह एक अच्छी शुरुआत है।
EBIT क्या है और ICR में इसका रोल
First, इसमें कमाई के लिए EBIT लिया जाता है।
For example, EBIT यानी Earnings Before Interest and Tax, यानी ब्याज और टैक्स काटने से पहले की operating कमाई।
यही कमाई बिक्री के मुकाबले कितनी बचती है, यह देखना भी उतना ही काम का है।
इसे operating profit margin kya hai इस guide से सीखिए।
So, EBIT interest coverage का मतलब है कि कंपनी ब्याज देने से पहले जितना कमाती है, वह ब्याज से कितना ज़्यादा है।
Interest Coverage Ratio Formula In Hindi
Also, interest coverage ratio formula बहुत छोटा है। नीचे दिया गया सूत्र देखिए।
ICR = EBIT ÷ Interest Expense
Here, Interest Expense का मतलब है कंपनी ने उस अवधि में कर्ज़ पर जो ब्याज चुकाना है।

दोनों आंकड़े company की profit and loss statement में मिलते हैं।
In addition, दोनों का समय एक जैसा रखिए, जैसे दोनों पूरे साल के।
Otherwise नतीजा गलत निकलेगा।
Interest Coverage Ratio Kaise Nikale? Example के साथ
Next, एक काल्पनिक कंपनी लेते हैं, जिसका नाम हम “ABC” रखेंगे।
ये आंकड़े सिर्फ समझाने के लिए हैं, असली नहीं।
First, मान लीजिए ABC का साल भर का EBIT 60 करोड़ रुपये है।
Next, उसी साल का ब्याज खर्च 20 करोड़ रुपये है।
So ICR = 60 ÷ 20 = 3 गुना आता है।
For example, इसका मतलब है कि कंपनी की कमाई ब्याज से तीन गुना है।
Then मान लीजिए अगले साल EBIT घटकर 40 करोड़ रुपये हो गया, पर ब्याज वही 20 करोड़ रहा।
Therefore ICR = 40 ÷ 20 = 2 गुना हो जाता है।
However, कर्ज़ वही रहा और ratio फिर भी गिर गया।
That is why सिर्फ एक साल का आंकड़ा देखना काफी नहीं है।
High vs Low Interest Coverage Ratio: क्या संकेत मिलता है?
So सवाल है कि ratio ज़्यादा हो या कम हो तो उसका क्या मतलब निकलता है।
चलिए आसान शब्दों में देखते हैं।
ज़्यादा ICR का मतलब आमतौर पर यह होता है कि कंपनी की कमाई ब्याज से काफी ऊपर है।
So, ब्याज भरना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
कम ICR का मतलब है कि कमाई और ब्याज के बीच गुंजाइश कम है।
However, कमाई थोड़ी भी गिरे तो ब्याज भरना मुश्किल हो सकता है।
अगर ICR 1 के आसपास हो, तो कंपनी की पूरी operating कमाई सिर्फ ब्याज में चली जाती है।
Therefore, ऐसी कंपनी पर नज़र ज़्यादा सावधानी से रखनी पड़ती है।
Because कंपनी का लिया हुआ कर्ज़ उसकी एक देनदारी है, पहले लायबिलिटी क्या होता है यह समझ लेना यहां काम आता है।
For instance, नीचे की table में तीन काल्पनिक कंपनियां हैं। यह सिर्फ उदाहरण है, कोई तय नियम नहीं।
| काल्पनिक कंपनी | EBIT | ब्याज खर्च | ICR | क्या संकेत मिल सकता है |
|---|---|---|---|---|
| कंपनी X (कम) | 10 करोड़ | 10 करोड़ | 1 गुना | कमाई सिर्फ ब्याज के बराबर, गुंजाइश बहुत कम |
| कंपनी Y (मध्यम) | 60 करोड़ | 20 करोड़ | 3 गुना | ब्याज भरने की ठीक-ठाक क्षमता, पर trend देखना ज़रूरी |
| कंपनी Z (ज़्यादा) | 80 करोड़ | 10 करोड़ | 8 गुना | ब्याज का दबाव कम, पर बाकी बातें भी जांचें |
ICR Kitna Hona Chahiye? Industry और Trend से जांचें
However, इसका कोई एक universal सही जवाब नहीं है।
Because यही सबसे बड़ी गलतफहमी है कि “इतने से ऊपर अच्छा, नीचे बुरा”।
First, industry देखिए।
For instance, जिन sector में कमाई स्थिर रहती है, वहां कंपनियां ज़्यादा कर्ज़ आराम से संभाल लेती हैं।
Meanwhile, जिन sector में कमाई ऊपर-नीचे होती रहती है, वहां कम ratio ज़्यादा जोखिम भरा लग सकता है।
So, तुलना हमेशा एक जैसे कारोबार वाली कंपनियों से कीजिए।
Next, trend देखिए।
Similarly, पिछले कई सालों में ratio बढ़ रहा है या घट रहा है, यह आज के आंकड़े से ज़्यादा कुछ बताता है।
Also, कमाई की growth को सही से पढ़ने के लिए stock market me CAGR kya hota hai वाली guide से सीख सकते हैं।
Finally, कंपनी की तुलना उसके peers और अपने पुराने आंकड़ों से कीजिए।
As a result, तस्वीर ज़्यादा सच्ची बनती है।
Interest Coverage Ratio की सीमाएं
Every ratio की अपनी हद होती है, और ICR भी इससे अलग नहीं है।
So, इसे पढ़ते समय यह जानना ज़रूरी है कि यह किन बातों को छोड़ देता है।
- मूल रकम की किस्त: ICR सिर्फ ब्याज देखता है, कर्ज़ की principal repayment नहीं।
- Cash flow: EBIT कागज़ की कमाई है, असली नकदी अलग हो सकती है।
- एक बार की कमाई: कभी-कभी EBIT में one-off आय शामिल होती है, जो हर साल नहीं आएगी।
- कर्ज़ का कुल बोझ: कंपनी पर कुल कितना कर्ज़ है, यह इससे नहीं दिखता।
That is why ICR को debt-to-equity ratio के साथ देखना समझदारी है।
Here, debt-to-equity बताता है कि कंपनी में कर्ज़ और अपनी पूंजी का अनुपात क्या है, जबकि ICR बताता है कि ब्याज भरना कितना आसान है।
In addition, कर्ज़ का कुल बोझ समझने के लिए company ki balance sheet kaise check kare यह guide काम आएगी।
Similarly, current ratio जैसी बातें भी साथ में देखें, और इसके लिए liquidity meaning in hindi पढ़ना मददगार रहेगा।
Fundamental analysis में कोई एक ratio पूरी कहानी नहीं सुनाता।
निवेशकों की आम गलतियां
Most beginners पहली बार ratio पढ़ते समय कुछ एक जैसी गलतियां करते हैं।
Even after समझ लेने के बाद कि interest coverage ratio kya hai, ये गलतियां अक्सर दोहराई जाती हैं।
- सिर्फ एक साल का ratio देखकर फैसला कर लेना।
- हर industry के लिए एक ही “अच्छा” नंबर मान लेना।
- EBIT की जगह profit after tax से ratio निकाल देना।
- Ratio ऊंचा देखकर बाकी जोखिम अनदेखा कर देना।
- अलग-अलग अवधि के EBIT और ब्याज को मिला देना।
Therefore, हर बार आंकड़े कंपनी की official financial statements से ही लीजिए।
Also, annual report mein red flag kaise pehchane यह सीखकर आप छिपे हुए जोखिम भी पकड़ सकते हैं।
एक ratio सिर्फ संकेत देता है, फैसला नहीं।
क्या आप भी interest coverage ratio जैसे ratios पढ़कर सही company चुनना चाहते हैं?
सिर्फ formula रटने से बात नहीं बनती, असली financial statements पर practice और mentor के जवाब ही फर्क बनाते हैं।
हमारी live classes में आप जुड़ सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और step by step सीख सकते हैं।
निष्कर्ष
In short, interest coverage ratio बताता है कि कंपनी की कमाई ब्याज को कितनी आसानी से कवर करती है। इसका फॉर्मूला सीधा है: ICR = EBIT ÷ Interest Expense।
However, industry, trend और peers से तुलना किए बिना यह अधूरा है। Also, सिर्फ एक साल का आंकड़ा देखकर कोई फैसला न लें।
Remember, ज़्यादा ICR का मतलब यह नहीं कि कंपनी में कोई जोखिम नहीं है। So, ICR को हमेशा debt-to-equity और cash flow के साथ मिलाकर पढ़िए।
Finally, आंकड़े हमेशा कंपनी की official financial statements से ही लीजिए।
As a result, आप किसी भी कंपनी का कर्ज़ का दबाव ज़्यादा समझदारी से परख पाएंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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